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गुरुवार, 26 नवंबर 2009

आकाशगंगा



हरहराकर
गिर रही आकाश गंगा
औ' प्रलय में घुल रहे अवसाद
नए मंदिर
ले रहे आकार
रचने को नया संसार

मरकत सा शहर

*

कोई
मरकत सा शहर
सुनसान है अब
चिमनियों में आग-
ना किलकारियाँ बारामदों में
ताल खाली
आसमां चुपचाप है अब