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बृहस्पतिवार, 14 जनवरी 2010
चाय गुमटी
*
सड़क है, शोर भी है
और बारिश साथ चलती है
हवा है साँस में नम सी
खुली छतरी
हाथ की बंद मुट्ठी में
और लो !
आ गई गुमटी चाय की।
1 टिप्पणियाँ:
mridula pradhan
16 अक्तूबर 2010 8:25 am
bahut achchi lagi.
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